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Friday, 23 December 2011

देश में महिलाओं के खिलाफ अत्याचार चरम पर!

नयी दिल्ली। भारत में महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार चरम सीमा पर पहुंच गए हैं और बिना किसी राहत के ये दिनों दिन बढ़ते जा रहे हैं। संसद की एक स्थायी समिति ने आज संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में यह कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा है कि राष्‍ट्रीय महिला आयोग को पूरे समर्पण के साथ अपने दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए। 

चंद्रेश कुमारी की अध्यक्षता वाली महिलाओं को शक्तियां प्रदान करने संबंधी संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि आज भी 80 फीसदी भारतीय महिलाओं को अपने विधिसम्मत अधिकारों की जानकारी नहीं है और कन्या भ्रूणहत्या या हत्या के अन्य रूपों के माध्यम से प्रत्येक वर्ष लगभग एक करोड़ लड़कियों का अस्तित्व मिट जाता है। समिति ने कहा है कि भारत में महिलाओं के साथ हो रहे अत्याचार चरम सीमा पर पहुंच गए हैं। 

ऐसी परिस्थिति में महिलाओं की बेहतर स्थिति बनाने का प्रयास करने और उनके जीवन के रक्षक का कार्य करने के लिए कोई ठोस कदम उठाने की जरूरत है। इसलिए समिति राष्‍ट्रीय महिला आयोग और राज्य महिला आयोगों को सामाजिक परिवर्तन के लाने के अभिकरण के रूप में देखती है और इच्छा व्यक्त करती है कि ये आयोग पूर्ण समर्पण के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करें। समिति ने इस बात पर निराशा जतायी कि राष्‍ट्रीय महिला आयोग में केवल एक अध्यक्ष, एक सदस्य और एक सदस्य सचिव है जबकि चार पद रिक्त पड़े हैं। समिति ने इन पदों को जल्द से जल्द भरे जाने की सिफारिश की है।-One India Hindi, गुरूवार, दिसंबर 22, 2011,14:02 [IST]

Thursday, 22 December 2011

यहां डॉक्टर ही नहीं मरीज व उनके परिजन भी करते हैं यौन उत्पीड़न!

पटना. जिले में सबसे अधिक यौन उत्पीडऩ की शिकार स्वास्थ्य क्षेत्र में कार्यरत महिलाएं होती हैं। इक्विटी फाउंडेशन के सर्वे परिणाम में ये बातें सामने आई। सर्वे में यह बात उभरकर आई कि पटना मेडिकल कालेज एंड हॉस्पिटल में पढऩे वाली नर्सों में 80 प्रतिशत यौन उत्पीडऩ व यौन हिंसा की शिकार होती हैं।

आंकड़ों की सत्यता पर पीएमसीएच की डॉक्टर रश्मि प्रसाद ने मुहर लगा दी। उन्होंने बताया कि नर्सों को डाक्टरों के अतिरिक्त पुरुष मरीजों व उनके परिजन भी उत्पीडि़त करते हैं। डॉक्टर रश्मि प्रसाद यौन उत्पीडऩ निषेध पर आयोजित एक दिवसीय राज्यस्तरीय कार्यशाला में बोल रही थी। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय के 'विशाखा गाइडलाइन' के बावजूद अब तक महिला उत्पीडऩ से संबंधित कोई भी कम्प्लेन कमेटी का गठन नहीं किया गया है।

सुबह नहीं पीते हैं पानी

डॉक्टर रश्मि ने कहा कि केवल नर्स ही नहीं बल्कि कई बार महिला डाक्टरों को भी उत्पीडऩ का शिकार होना पड़ता है। उन्होंने बताया कि पीएमसीएच के कई विभागों में महिला डॉक्टरों के लिए अलग प्रसाधन तक उपलब्ध नहीं है। शौचालय जाने की नौबत नहीं आए इसलिए कई महिला डॉक्टर सुबह पानी नहीं पीते हैं।

सदन में लेते है चटखारा

विधान पार्षद किरण घई ने कहा कि महिला संबंधी बातों में कई विधायक एवं पार्षद भी चटखारा लगाने से बाज नहीं आते। अगर वह कमजोर पड़ती है तो छींटाकशी तक की जाती है। उन्होंने कहा कि आज यौन उत्पीडऩ के बारे में सभी जानते है बावजूद इसके इसमें कमी नहीं हो रही हैं।

क्या है विशाखा गाईडलाईन ?

कार्य क्षेत्र में होने वाले यौन उत्पीडऩ को रोकने के लिए 13 अगस्त 1997 को उच्चतम न्यायालय ने विशाखा गाइडलाइन जारी किया। जिससे महिलाएं अपने कार्यक्षेत्र में भयमुक्तऔर सम्मान के साथ काम कर सके।

मुख्य अनुशंसा

नियोक्ता अपने कर्मचारियों के बीच यौन उत्पीडऩ रोकने के लिए वातावरण बनाएगा।
प्रत्येक कार्यालय में यौन उत्पीडऩ की शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था होगी।
जांच के लिए शिकायत कमेटी होगी, जिसकी मुखिया कोई महिला होगी।
कमेटी में महिलाओं की संख्या अधिक होगी।
यौन उत्पीडऩ कानून का उल्लंघन करने वालों पर विधि सम्मत कार्रवाई की जाएगी। Source: भास्कर न्यूज़| Last Updated 01:55(22/12/11)

Wednesday, 21 December 2011

शोषण का नया हथियार!

[माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के कर्ज के जाल में फंसी ग्रामीण महिलाओं की परेशानियों का उल्लेख कर रही है सुभाषिनी सहगल अली]

महिला सशक्तीकरण कुछ सालों से सरकार का पसंदीदा मंत्र रहा है। विश्व बैंक के दिशा-निर्देश पर हमारे देश में पिछले दो दशकों से महिलाओं के बचत समूह बनाने पर बहुत जोर दिया जा रहा है। करोड़ों महिलाओं को इन बचत-गुटों मे संगठित किया गया है और उन्हें समूह की सामूहिक बचत राशि के आधार पर मिलने वाले कर्ज से उत्पादन करने और बेचने के लिए प्रोत्साहित किया गया है। महिलाएं इतनी जरूरतमंद है और किसी तरह के रोजगार या कमाई करने के मौके के लिए इतनी लालायित है कि उन्होंने समूहों में बहुत ही उत्साह के साथ शामिल होना स्वीकार किया है, लेकिन इसके खतरनाक नतीजे सामने आए है। उनकी बचत पर मिलने वाला ब्याज और उन्हे दिए गए कर्ज पर उनसे वसूल किए जाने वाले ब्याज के बीच भारी अंतर है। इतना ही नहीं, अगर वे किसी तरह के उत्पादन में अपनी धनराशि लगाती है तो उसे बेचने में उन्हें बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त बीमारी, फसल की बर्बादी या किसी आपदा के कारण अक्सर गरीब महिलाएं अपनी किस्त समय से जमा नहीं कर पाती है।

महिलाओं की मांग है कि उन्हे रियायती दरों पर बैंकों से कर्ज मिले और उनके उत्पादन की बिक्री में सरकार उनकी मदद करे। केरल, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल की वाम सरकारों ने बचत समूहों को राष्ट्रीयकृत बैंकों से मिलने वाला कर्ज मात्र 4 फीसदी ब्याज पर दिलवाया और ब्याज दरों का बाकी अंतर खुद वहन किया। इन राज्यों में बचत-समूहों को सरकार की ओर से काम करने और अपने द्वारा बनाए गए सामान की बिक्री करने में काफी मदद मिलती है।

ऐसे समय जब महिलाओं के सामने लड़कर इस योजना में आवश्यक सुधार लाने के रास्ते खुल रहे थे, सरकार ने अपनी असल मंशा स्पष्ट कर दी। यह कवायद महिलाओं की मदद के लिए नहीं, बल्कि जनता के बहुत बड़े हिस्से के संसाधनों को निजी कंपनियों के हवाले करने की है। सरकार ने गरीब औरतों के शोषण का एक नया जरिया तैयार कर दिया है-अति लघु वित्तीय कंपनियां यानी माइक्रो फाइनेंस कंपनियां। अब बचत समूहों को राष्ट्रीयकृत बैंकों से मिलने वाले कर्ज की धनराशि घटती जा रही है और यह रकम इन अति-लघु वित्तीय कंपनियों को दी जा रही है, जो इस पैसे को मनमानी ब्याज दरों पर गरीब महिलाओं को मुहैया करा रही है।

अपने इस कदम के समर्थन में सरकार मोहम्मद यूनुस का नाम लेती है, जिन्होंने बांग्लादेश में ग्रामीण बैंक स्थापित किया था और जिन्हें नोबेल प्राइज से नवाजा गया था। उनके बारे में कहा जाता था कि वह करोड़ों गरीब महिलाओं के मित्र है और बचत समूहों को दिया जाने वाला कर्ज गरीबी दूर करने की जादू की छड़ी है। 1976 में उन्होंने 42 औरतों को इकट्ठा करके ग्रामीण बैंक शुरू किया था। 2006 तक यह बैंक हजारों गांवों मे फैल चुका था और लाखों औरतों को कर्ज बांटने का काम कर रहा था। उसकी तर्ज पर भारत समेत 32 देशों में काम होने लगा, लेकिन पिछले साल बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने मोहम्मद यूनुस को ग्रामीण बैंक से हटाकर उनकी और बैंक की गतिविधियों की जांच शुरू कर दी। जांच के दौरान सनसनीखेज तथ्य सामने आए है। बांग्लादेश में आत्महत्या करने वाली हर चौथी महिला ग्रामीण बैंक की कर्जदार है। ग्रामीण बैंक गरीब महिलाओं को इतनी ऊंची ब्याज दरों पर कर्ज देता है कि उसे अदा करने के लिए उन्हे उसी बैंक से नए कर्ज लेने पड़ते है और इस प्रकार वे कर्ज के जाल में बुरी तरह फंस जाती हैं। बैंक में भ्रष्टाचार भी सामने आया है। नार्वे की एक एजेंसी ने ग्रामीण बैंक को करीब एक करोड़ रुपये इस शर्त पर दिए थे कि उसका इस्तेमाल केवल औरतों को दिए जाने वाले कर्ज के लिए होगा, लेकिन यूनुस ने उस पैसे को अपनी ही एक अन्य कंपनी के नाम स्थानांतरित कर दिया और फिर उसे कर्ज के रूप में ग्रामीण बैंक को दे दिया। इसके अलावा मोहम्मद यूनुस ने अपनी झूठी उपलब्धियों का बखान करने के लिए कई फर्जी डाक्यूमेंटरी फिल्में भी तैयार की थीं।

जांच के दौरान यह भी पता चला कि ग्रामीण बैंक को कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से तीन फीसदी सालाना ब्याज दर पर मोटा पैसा मिला था, जो उसने गरीबों को 40 से 50 फीसदी ब्याज दर पर कर्ज के रूप में बांट दिया था। गरीब कर्जदारों से कर्ज वसूली इतने अमानवीय तरीके से की जाती थी कि बहुत सी महिलाओं ने आत्महत्या कर डाली।

अफसोस है कि इस प्रकरण से सबक लेने के बजाय हमारी सरकार इसे उदाहरण के रूप में पेश कर रही है। सरकार ने अति लघु वित्तीय संस्थाओं को खुली छूट दे रखी है। ये कंपनियां पैदा होते ही अनाप-शनाप मुनाफा कमाने लगती है। गरीबों से लूट-खसोट के बल पर ही माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के तीन साल में मुनाफे में कई गुना वृद्धि हो गई। एक माइक्रोफाइनेंस कंपनी का मुनाफा 2007-08 में 170 करोड़ से बढ़कर 2009-10 में 959 करोड़ रुपये हो गया। इसी प्रकार एक अन्य कंपनी का साढ़े छह करोड़ से बढ़कर 222 करोड़ रुपये हो गया। इस तरह की मुनाफाखोरी शायद ही अर्थव्यवस्था के किसी भी क्षेत्र में हुई होगी।

माइक्रो फाइनेंस कंपनियों की लूटखसोट और गुंडागर्दी के दुष्परिणाम सामने आने लगे है। पिछले दिनों आंध्र प्रदेश में माइक्रो फाइनेंस कंपनियों के उत्पीड़न से तंग आकर 30 महिलाओं ने आत्महत्या कर ली। उड़ीसा में भी आठ महिलाओं ने आत्महत्या की है। राष्ट्रीयकृत बैंकों का कहना है कि ये कंपनियां उनसे 8-10 फीसदी ब्याज दर पर कर्ज लेकर गरीब महिलाओं से 150 फीसदी तक ब्याज वसूलती है। अफसोस है कि सरकार चलाने वालों के पास अपने पड़ोसी की तरफ देखने और उसके कड़वे अनुभव से सीखने की फुर्सत ही नहीं है?-Jagran, [लेखिका: लोकसभा की पूर्व सदस्य हैं] Dec 21, 12:04 am

Tuesday, 20 December 2011

फतेहपुर में पुलिस उत्पीड़न की शिकार अर्चना को चाहिए ‘इच्छामृत्यु’


वो कब कहां होती है... किसी को नहीं पता... न रात ठीक से गुज़रती है और न ही दिन। न जाने कौन से शहर में सुबह होगी और कौन से शहर में शाम। वो पुलिस के डर से मारी-मारी फिर रही है। यूपी के फतेहपुर में पुलिस उत्पीड़न का कथित शिकार अर्चना ने राष्ट्रपति महामहिम श्रीमती प्रतिभा पाटिल से इच्छामुत्यु की गुहार लगाई है। राष्ट्रपति को लिखी चिट्ठी में फतेहपुर की मुराइन टोला की रहने वाली विधवा अर्चना ने साफ कहा है कि दो साल पूर्व पति की मौत के बाद उसे ससुराली जनों द्वारा लगातार परेशान किया जाता रहा है, और तंग आकर वो अपने ससुराल का घर भी छोड़ना पड़ा है।

चिट्ठी के मुताबिक ससुराली जनों से अर्चना का विवाद फतेहपुर की माननीय अदालत में विराराधीन है, लेकिन इधर उसे स्टेट बैंक की कृषि विकास शाखा में हुए एक 60 लाख के एक फर्ज़ीवाड़े में उसे जबरन मुख्य आरोपी बना दिया गया है। अर्चना के मुताबिक इस मामले में ससुराली जनों के प्रार्थना पत्र पर फतेहपुर पुलिस उसे जबरन इस फर्जीवाड़े का मुख्य आरोपी बता रही है। इस मामले में आरोपी बैंककर्मी सचिन वर्मा से उसके टेलिफोनिक संपर्क को आधार बनाया गया है। अर्चना का कहना है ये धोखाधड़ी जिस खाते के ज़रिये हुई है, उसमें परिचयकर्ता मेरे जेठ श्री मनोज कुमार हैं और मामले के आरोपी सचिन वर्मा ससुराली जनों का पारिवारिक मित्र रहा है। 

अर्चना का कहना है कि इस मामले में जांच अधिकारी जे पी यादव इस मामले में 101% जेल भिजवाने की धमकी दे चुके हैं। बातचीत के दौरान जांच अधिकारी जे पी यादव कई बार मुझसे बाहर अकेले में मिलने और ‘शर्ते’ मान लेने पर इस केस में राहत देने की बात भी कह चुके हैं। फर्जीवाड़े के इस मामले में जबरदस्ती मुख्य आरोपी बनाते हुए अर्चना के खिलाफ धारा 409, 419, 420, 467, 468 और 120 बी दर्ज की गई हैं और उसका निलंबन भी करा दिया गया है। अर्चना ने आरोप लगाया है कि जांच अधिकारी ने पहले से ही हेडराइंटिग एक्सपर्ट से बैंक दस्तावेजों की हेडराइंटिंग मिलाने की धमकी दी थी और उन्होंने ऐसा किया भी है। अर्चना का आरोप है कि इन लोगों द्वारा लगातार बेबुनियाद तरीके से उसके चरित्र हनन की भी कोशिश की जाती रही है। राष्ट्रपति से गुहार लगाते हुए अर्चना ने इच्छामुत्यु की इजाजत मांगी है और कहा है कि ससुराली जनों और फतेहपुर पुलिस (जांच अधिकारी श्री जे पी यादव) की मिलीभगत से लगातार रची जा रही साज़िश के बाद वो बेहद आहत है और इंसाफ न मिलने की सूरत में मेरे लिए खुदकुशी के अलावा कोई रास्ता नहीं बच जाएगा।-Published on Tuesday, 20 December 2011 20:23Written by अमर आनंद की रिपोर्ट, Source : bhadas4media

गांव के दबंगों का अत्याचार, परिवार का कर दिया हुक्का-पानी बंद

राजसमंद. कुंभलगढ़ उपखंड के कला की भागल (जेतारण) में कुछ लोगों ने एक आदिवासी परिवार का हुक्का पानी बंद कर करवा दिया। गांव के इन दबंगों ने परिवार का राशन-पानी और बच्चों के स्कूल में पढ़ने पर प्रतिबंध लगवा दिया। परेशान होकर परिवार को गांव छोड़ना पड़ा।

इसका कसूर इतना है कि परिवार का मुखिया जवाराम पुत्र उमा भील उन दबंग लोगों के अवैध संबंधों को प्रचारित करता रहा है। इसको लेकर उसके साथ मारपीट भी गई। यह परिवार सोमवार को पुलिस अधीक्षक डा. नितिनदीप के समक्ष पेश हुआ और आप बीती सुनाई। कला की भागल निवासी जवाराम पुत्र उमा भील की ओर से पुलिस अधीक्षक को लिखित में की गई शिकायत में गांव के भवानीशंकर जोशी, अंशु जोशी, सुरेश जोशी, मोहनलाल जोशी, उदयलाल जोशी, डालू जोशी, भगवतीलाल जोशी, भोपाल सिंह पर ये आरोप लगाए हैं।

जवाराम ने आरोप लगाया कि उस पर 11 हजार रुपए जुर्माना देने का फरमान भी जारी किया गया। उसका कहना है कि परिवार ने सिजारे के खेत में फसल खड़ी है और सिंचाई के अभाव में फसल खराब हो सकती है। ज्ञापन में आरोप लगाया गया कि आरोपियों ने उसके साथ मारपीट कर बुरी तरह जख्मी कर दिया, तो केलवाड़ा थाने में रिपोर्ट दी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। चिकित्सकों ने फ्रैक्चर की आशंका जताई, फिर भी केलवाड़ा पुलिस द्वारा उसका मेडिकल नहीं करवाया गया।

जवाराम भील द्वारा लगाए गए आरोप निराधार हैं। इसके बाद भी उसके द्वारा आरोपित व्यक्तियों के खिलाफ शांति भंग के तहत कार्रवाई की जा चुकी है तथा मामले में जांच भी की जा रही है। मदनसिंह चुंडावत, थानाधिकारी, केलवाड़ा मामले को लेकर ज्ञापन मिला है। इस संबंध में संबंधित थानाधिकारी को जांच करने के निर्देश दिए हैं।
-नितिनदीप बल्लग्गन, पुलिस अधीक्षक, राजसमंद
Source: bhaskar news | Last Updated 04:24(20/12/11)

Friday, 16 December 2011

बच्चों के यौन उत्पीड़न के 1000 मामले!

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने पिछले पांच साल के दौरान बच्चों के यौन उत्पीड़न के एक हजार से अधिक मामले दर्ज किए हैं। इनमें से लगभग 20 प्रतिशत मामलों में उत्पीड़न परिवार के किसी सदस्य ने ही किया।

महिला एवं बाल विकास मंत्री कृष्णा तीरथ ने शुक्रवार को लोकसभा को बताया कि आयोग को 1059 शिकायतें मिली हैं। ये शिकायतें एक जनवरी 2007 से दिसंबर 2011 के बीच मिली हैं।

उन्होंने एक सवाल के लिखित जवाब में बताया कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने चालू वर्ष के लिए इस तरह की घटनाओं के आंकडे जारी नहीं किए हैं। जहां तक पांच साल के आंकड़ों का सवाल है, 156 मामलों में बच्चे के साथ यौन र्दुव्‍यवहार करने वाले उनके परिवार का ही कोई व्यक्ति था। (भाषा)-hindiwebduniadotcom, नई दिल्ली, शुक्रवार, 16 दिसंबर 2011( 23:55 IST )

Saturday, 3 December 2011

यौन उत्पीड़न का झूठा केस महिला को महंगा पड़ा

नई दिल्ली।। यौन उत्पीड़न का फर्जी केस फाइल करना एक महिला को अच्छा-खासा महंगा पड़ गया। महिला ने 15 साल पहले उत्तरी रेलवे के एक सीनियर ऑफिसर पर यौन शोषण का आरोप लगाया था। कोर्ट ने महिला को आदेश दिया है कि वह रिटायर हो चुके इस ऑफिसर को अब 5 लाख रुपये का मुआवजा दे।

अडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज राजेंद्र कुमार शास्त्री ने अपने फैसले में कहा कि महिला ने 74 साल के इस पूर्व अधिकारी को मानसिक रूप से चोट पहुंचाने के साथ ही उनकी इज्जत पर बट्टा लगाया है। कोर्ट ने कहा, 'हर पुरुष का अपना एक स्टेटस होता है और उसे अपनी मान-प्रतिष्ठा के बचाव का अधिकार है।' 

महिला ने आरोप लगाया था कि 1996 में इस अधिकारी ने उसका यौन शोषण किया था। वह तब उत्तरी रेलवे में चीफ पर्सनल ऑफिसर की सेक्रेटरी थीं। सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्राइब्यूनल (कैट) ने महिला के पक्ष में फैसला सुनाया था। सन् 2008 में दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले को 'फर्जी' करार देते हुए कैट के आदेश को खारिज कर दिया था। 

पूर्व अधिकारी ने तब महिला के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर कर दिया और 10 लाख रुपये के मुआवजे का दावा ठोक दिया। पूर्व अधिकारी ने यह मुआवजा 'भावानात्मक सदमे' की एवज में मांगा था जिससे उन्हें गुजरना पड़ा। 

पूर्व अधिकारी का दावा था कि काम न करने पर फटकार लगाने के बाद महिला ने उन पर यह आरोप लगाया। उनका कहना था कि इस पूरे मुकदमेबाजी के दौरान उन्हें लोगों के बीच शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। 

जज ने कहा कि याचिकाकर्चा (पूर्व अधिकारी) के खिलाफ कोई सबूत नहीं है। बाद में महिला ने कोर्ट से गुहार लगाई कि वह विधवा है और इतनी बड़ी पेनल्टी नहीं चुका सकती है। हालांकि, कोर्ट ने महिला के प्रति सद्भावना जताते हुए कहा कि उनकी वर्तमान और आर्थिक स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन, मुआवजे का मकसद महिला को सजा देना नहीं, बल्कि पीड़ित को सांत्वना देना है।
2 Dec 2011, 1347 hrs IST,टाइम्स न्यूज नेटवर्क, Nav Bharat Times

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